यदि किसी जातक को अपनी जन्म तिथि का ज्ञान नहीं होता उनको घबराने की
आवश्कयता नहीं है क्योंकि ज्योतिष शास्त्र में इसका भी समाधान है कि जातक
की समस्याओ के अध्ययन के लिए एक शुभ मुहूर्त के चयन के लिए,वर्षफल बनाने के
लिए या जातक की जन्म कुण्डली उपलब्ध न हो तो मेदिनी ज्योतिस में इस प्रयोग किया जाता है ।
बिना जन्म तिथि के कुण्डली बनाने के लिये पांच चीजो की आवश्यकता होती है :-
1 जातक के नाम का प्रथम अक्षर । 2 जातक के नाम का प्रथम स्वर ।
यदि किसी जातक के जन्म समय का ज्ञान न हो तो उस जातक
नाम से ही तिथि,नक्षत्र,राशि,अक्षर और स्वर से ही पता लगाया जा सकता है ।
नाम किसी भाषा में हो सकता है । जब जातक उससे बुलाया जाये वह पलट कर उसका
उत्तर दे जरूरी है ।
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क ख ग घ च
छ ज झ ट ठ
नाम के प्रथम अक्षर से ही स्वर का पता लगेगा उसकी
तालिका निम्नलिखित है
क ख ग घ च
छ ज झ ट
ड ढ त थ द
ध न प फ ब
भ म य र ल
छ ज झ ट z
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क ख ग घ च
छ ज झ ट ठ
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क ख ग घ च
छ ज झ ट ठ
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छ ज झ ट ठ
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क ख ग घ च
छ ज झ ट ठ
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स्वर
अ इ उ ए
क ख ग घ च
छ ज झ ट
ड ढ त थ द
ध न प फ ब
भ म य र ल
व श ष स ह
जातक के नाम के प्रथम अक्षर से उसकी जन्म तिथि के ज्ञान प्राप्त करने की विधि इस प्रकार से है :- विभिन्न प्रकार के अक्षरों और स्वरों के लिए तिथियाँ इस प्रकार है ।
नन्दा भद्रा जया रिक्ता पूर्णा
लग्न कुण्डली -डी 1
इसके द्वारा राशि कुण्डली -डी 1 बनाई जा सकती है । ज्योतिष शास्त्र में सबसे महत्वपूर्ण होती लग्न कुण्डली होती है व चन्द्र कुण्डली भी कहते है ।
होरा कुण्डली -(डी 2 ) इस माध्यम से जातक की होरा कुण्डली भी तैयार की जा सकती है जिससे जातक कि धन-सम्पति,
समृद्दि और द्धितीय भाव के कारकत्वों का विचार कर सकते है ।
1, 6, 11 2, 7,12 3,8,13 4, 9,14 5,10,15
इस प्रकार तिथि के आधार से जन्म तिथि का ज्ञान करके जातक कि
जन्म कुण्डली तैयार करके नक्षत्र,ग्रह,गोचर व उन पड़ने वाली द्रष्टी के आधार
पर भविष्य कथन करना एक बेहद सरल तरीका है शुक्ल पक्ष में शुभ ग्रह अपने अगले नक्षत्र कोदृष्टि को देता है और कृष्ण
पक्ष में पीछे की ओर से अशुभ ग्रह उल्टा करता है तथा शुक्ल पक्ष में पूर्ण
फल और कृष्ण पक्ष में आधा फल का असर होता है ।
इसके द्वारा राशि कुण्डली -डी 1 बनाई जा सकती है । ज्योतिष शास्त्र में सबसे महत्वपूर्ण होती लग्न कुण्डली होती है व चन्द्र कुण्डली भी कहते है ।
होरा कुण्डली -(डी 2 ) इस माध्यम से जातक की होरा कुण्डली भी तैयार की जा सकती है जिससे जातक कि धन-सम्पति,
द्रेष्कोंण (डी -3 ) जातक की राशि के द्रेष्कोंण का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है । कोण तीन प्रकार के है प्रथम -नारद द्रेष्कोणा,दूसरा -अगस्म्य,तीसरा -दुर्वासा द्रेष्कोंण भी कहलता है । और देखा जा सकता है ।
समृद्धि और द्वितीय भाव के कारकत्वों का विचार कर सकते है ।
होरा दो प्रकार की होती है जैसे कि सूर्य होरा और चन्द्र होरा
चतुर्थाश(डी-4 ):- इस वर्ग से जातक की चल -सम्पति,सौभाग्य और वाहन के विषय के बारे जाना सकता है ।
चतुर्थाश(डी-4 ):- इस वर्ग से जातक की चल -सम्पति,सौभाग्य और वाहन के विषय के बारे जाना सकता है ।
इसके द्वारा जातक की नवांश कुण्डली -(डी -9 ) का बोध भी किया जा सकता है ।
डी -9 :- यह जातक के जीवन का महत्वपूर्ण वर्ग है । जन्म कुण्डली के किसी
भी ग्रह के बलाबल को यह वर्ग स्पष्ट रूप से बतलाता है । इसके द्वारा जीवन
साथी व विवाह के समय का निर्धारण और चरित्र के बारे बतलता है ।
सप्तांश (डी-7) :- इस कुण्डली से जातक की सन्तान,सन्तान से प्राप्त होने वाले सुख, सन्तान के लिंग और सन्तान से सम्बधिन्त और पाटर्नर के विषय में जानना जा सकता है ।
त्रिशांश (डी-30):- इस वर्ग कुण्डली से जातक के सुख एवं दुःख आने वाले अरिष्ट और चरित्र को ज्ञात किया जा सकता है
द्वादशांश -(डी -12 ):- जातक का यह वर्ग भी बनाया जा सकता है । जिससे जातक के माता -पिता की आयु, उनके सामाजिक,एवं आर्थिक स्तर ,उनसे प्राप्त होने वाले सुख आदि के लिए किया जाता है ।
सप्तविंशांशं (डी-27):-
इस वर्ग को नक्षत्रांश कहते है । इसके जातक के शरीरिक और मानसिक बल और निर्बलता को देखा जा सकता हैं । 30 अंश के 27 भाग किये जाते है ।
त्रिशांश (डी-30):- इस वर्ग कुण्डली से जातक के सुख एवं दुःख आने वाले अरिष्ट और चरित्र को ज्ञात किया जा सकता है
द्वादशांश -(डी -12 ):- जातक का यह वर्ग भी बनाया जा सकता है । जिससे जातक के माता -पिता की आयु, उनके सामाजिक,एवं आर्थिक स्तर ,उनसे प्राप्त होने वाले सुख आदि के लिए किया जाता है ।
दशमांश-(ड़ी-10):-
यह वर्ग आजीविका, जीविका से प्राप्त होने वाली सफलताओ और सफलताओं की
प्रवृति एव स्तर,आदर सम्मान और जीवन में प्राप्त होने वाली अन्य सभी की
सफलताओं का अध्धयन इसप्रकार कुण्डली द्र्वारा किया जा सकता है ।
षोडशांश(डी-16):-
इस वर्ग की कुण्डली वाहन एव सामान्य सुख के विषय में जाना जा सकता है । प्रत्येक राशि के 30 अंशों को 1 डिग्री 52'30" के 16 भागों में बाटा जाता है ।
विंशांश (डी-20):-
इस वर्ग द्र्वारा जातक की प्रार्थना,पूजा-पाठ और भगवान से प्राप्त होने वाली कृपा को देखा जा सकता है ।
चतुर्विशांश(डी-24):-
इस वर्ग के द्वारा जातक की शिक्षा -दीक्षा और शैक्षिक प्राप्तियो भी देखी जा सकती है । छ ज झ ट z
ड़ ढ त थ द
ध न प फ ब
भ म य र ल
व श ष स ह
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नाम
का
प्रथम
स्वर
क ख ग घ च
छ ज झ ट ठ
ड़ ढ त थ द
ध न प फ ब
भ म य र ल
व श ष स ह
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नाम
का
प्रथम
स्वर
क ख ग घ च
छ ज झ ट ठ
ड़ ढ त थ द
ध न प फ ब
भ म य र ल
व श ष स ह
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नाम
का
प्रथम
स्वर
छ ज झ ट ठ
ड़ ढ त थ द
ध न प फ ब
भ म य र ल
व श ष स ह
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नाम
का
प्रथम
स्वर
क ख ग घ च
छ ज झ ट ठ
ड़ ढ त थ द
ध न प फ ब
भ म य र ल
व श ष स ह
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नाम
का
प्रथम
स्वर
क ख ग घ च
छ ज झ ट ठ
ड़ ढ त थ द
ध न प फ ब
भ म य र ल
व श ष स ह

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